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तीसरे विश्वयुद्ध की आशंका के साथ-साथ इजरायल-ईरान युद्ध की आशंका भी बढ़ी; अमेरिका में हाई अलर्ट जारी

इजरायल-हमास युद्ध के बीच अब इजरायल और ईरान में भी जंग की आशंका बढ़ गई है। इसके चलते अमेरिका हाई अलर्ट पर है। अगर ऐसा हुआ तो तीसरे विश्व युद्ध की आशंका और अधिक प्रबल हो जाएगी। बता दें कि बीते हफ्ते सीरिया में ईरानी दूतावास पर इजरायली एयरस्ट्राइक में ईरान के 7 कर्मियों की मौत हो गई थी। इसके बाद से ईरान युद्ध की तैयारी में जुट गया है। ईरान ने इजरायल को इस एयरस्ट्राइक का बदला लेने की कसम खाई है। ऐसे में इजरायल-ईरान युद्ध छिड़ने की प्रबल आशंका के मद्देनजर अमेरिका हर हालात पर बारीकी से नजर रख रहा है।

इजरायल और ईरान के बीच हमास युद्ध शुरू होने के बाद से ही तनाव चरम पर है। ईरान गाजा में इजरायली हमले का विरोध करता रहा है। मगर युद्ध नहीं रोकने की सूरत में ईरान समर्थित चरमपंथी और आतंकी गुट इजरायल पर हमला कर रहे हैं। इसमें मिलिशिया, हिजबुल्ला और हूतिये जैसे आतंकवादी गुट शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि ईरान-इज़रायल छाया युद्ध की जड़ें 1979 में ईरान के अंतिम राजा, शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी के तख्तापलट से जुड़ी हैं। छह महीने से आतंकी संगठन हमास के खिलाफ जंग लड़ रहे इजरायल को अब एक और मोर्चा मजबूत करने की जरूरत है।

ईरान ने किया युद्ध के लिए तैयार होने का ऐलान

सीरिया में अपने दूतावास पर हमले के बाद ईरान ने कहा है कि वह युद्ध के लिए तैयार है और इसरायल को एक ‘तमाचा’ मारेगा। ईरान की यह टिप्पणी दमिश्क में उनके वाणिज्य दूतावास पर इजरायली हवाई हमले के बाद आई है, जिसमें दो जनरलों सहित कम से कम सात ईरानी मारे गए थे। जबकि इज़राइल ने पिछले कुछ महीनों में सीरिया में ईरान से जुड़ी संपत्तियों को बार-बार निशाना बनाया है। उसके बाद यह पहली बार था जब किसी ईरानी राजनयिक भवन पर हमला हुआ।

अमेरिका के साथ इजरायल भी अलर्ट पर 

ईरान की ओर से हमले की धमकी मिलने के बाद से इज़रायल भी तब से अलर्ट पर है। इजरायल ने अपने लड़ाकू सैनिकों की घरेलू छुट्टियाँ रद्द कर दी हैं। साथ ही रिजर्व फोर्स को भी बुला लिया है और शहरों में हवाई सुरक्षा बढ़ा दी है। इजरायली सेना ने देश पर दागे जा सकने वाले जीपीएस-नेविगेटेड ड्रोन या मिसाइलों को बाधित करने के लिए गुरुवार को तेल अवीव के ऊपर नौवहन संकेतों की भी गहराई से पड़ताल की है। ताकि उन्हें विफल किया जा सके।

इज़रायल-ईरान युद्ध की यहां से जुड़ी हैं जड़ें

इजरायल-ईरान के संघर्ष की छाया की जड़ें 1979 में ईरान के अंतिम राजा, शाह मोहम्मद रजा पहलवी के तख्तापलट से जुड़ी हैं। इस्लामी क्रांति के बाद ईरान के नेताओं ने इजरायल विरोधी रुख अपनाया और खुद को लेबनान में हिजबुल्लाह और फिलिस्तीन के हमास जैसे समूहों के साथ जोड़ लिया। इस तरह से धीरे-धीरे इजरायल और ईरान की दुश्मनी बढ़ती गई। क्रांति के नेता अयातुल्ला रूहुल्लाह खुमैनी ने एक नया विश्वदृष्टिकोण लाया था जो मुख्य रूप से इस्लाम का समर्थक था। उन्होंने “अहंकारी” विश्व शक्तियों के खिलाफ लड़ाई का आह्वान किया था जो अपने हितों की पूर्ति के लिए फिलिस्तीनियों सहित – दूसरों पर अत्याचार करती हैं।

ईरान में नई सरकार ने इज़रायल को “छोटा शैतान” कहना शुरू किया

इस बीच ईरान में नई सरकार बनने के बाद दुश्मनी की जड़ें इजरायल के साथ और गहराती रहीं। ईरान ने इजरायल को छोटा शैतान और अमेरिका को सबसे बड़ा शैतान कहना शुरू कर दिया।  ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं को इज़रायल अस्तित्व के लिए ख़तरे के रूप में मानता है और कथित तौर पर उसके परमाणु कार्यक्रम को विफल करने के लिए गुप्त अभियान चला रहा है। इज़रायल और ईरान के बीच झड़पें विचारधाराओं या छद्म समूहों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दोनों देश अक्सर एक दूसरे पर हमला करते रहते हैं। लेकिन दोनों सार्वजनिक रूप से हमलों को अंजाम देने से इनकार करते हैं।

यही कारण है कि संघर्ष को “छाया युद्ध” के रूप में जाना जाता है जो क्षेत्र के कई अन्य देशों में फैल गया है। वहीं लेबनान इन दो मध्य पूर्वी देशों के बीच छाया युद्ध में युद्ध के मैदानों में से एक के रूप में कार्य करता है। जबकि हिजबुल्लाह इस क्षेत्र में ईरान के हितों के लिए एक प्रॉक्सी के रूप में उभर रहा है। लेबनान में इज़रायली घुसपैठ साथ ही इज़रायल में हिज़्बुल्लाह के रॉकेट हमलों ने सीमा पर हिंसा के चक्र को कायम रखा है।

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